Description
पुस्तक ‘लोकतंत्र की सार्थकता’ में लेखक देवेन्द्र नाथ राय ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों, उसके मूल उद्देश्यों तथा मानवीय मूल्यों के संदर्भ में गहन विचार-विमर्श प्रस्तुत किया है। पुस्तक में बढ़ती राजनीतिक स्वार्थपरता, भ्रष्टाचार, असमानता, जातीय एवं सांप्रदायिक विभाजन जैसी समस्याओं का विश्लेषण करते हुए लोकतंत्र को अधिक मानवीय और उत्तरदायी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। भारतीय दार्शनिक परंपरा, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तथा नव्य-मानवतावाद के दृष्टिकोण से लेखक ने एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना की है, जो समस्त समाज के सर्वांगीण विकास और विश्वबंधुत्व की दिशा में अग्रसर हो। यह कृति लोकतंत्र के स्वरूप, उसकी सीमाओं और संभावित समाधानों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करने वाली एक महत्वपूर्ण वैचारिक पुस्तक है।






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