दीवार

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बीच आंगनियाँ दीवार का उठ रई
आबो जाबो बंद कर रये ।
लोग लड़का तौ ठीकई हैं
मौडा मौड़ी भी नइँ आ रये ।
तनक बहस पे दीवार खिंच गयी
एक दूसरन ख़ौ आंख दिखा रये ।
कल तक हंसी ठिठोली होत ती
आज बँटवारो करवा रये ।
अटारी आधी आधी बंट गयी
चौके चूल्हे दो दो हो रये ।
माँ ख़ौ कोऊ रखवे राजी नइयां
तै ले जा और संगे रख ले कै रये ।
बीच खड़ी बा अभागन सोचे
मोय काय जिंदा छोर रये ।
जो दीवार उठा रये बीच में
हमाये आंसू ख़ौल रये ।
लुगाइयों की बातन में आके
लोग लड़का झगड़ रये ।
अलग अलग हो जाते ठीक है
जे तौ सूरत ना देखवे कि कै रये ।
बच्चन के बीच भी दीवार उठ गई
एक दूजे ख़ौ दुश्मन मान रये ।
संगे खेलत फिरत हते जो
अब मौ तक नइँ बोल रये ।
तनक तनक सै मौडा मौड़ी
एक दूसरे ख़ौ मौ चिड़ा रये ।
— जयति जैन “नूतन”

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