ग़ज़ल

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सोच रहा हूँ दोस्त हमारा भी तो है इंसानों में
कितना ज़हर छुपा रखा है होठों के मुस्कानों में

कुंभकार का चाक देखकर मन बोझिल हो जाता है
जाने क्या-क्या दिख जाता है मिट्टी के सामानों में

शमा रौशन होते ही ये कहाँ-कहाँ से आ जाते
जल जाने की चाहत इतनी होती क्यों परवानों में

काया दमक रही है तो मन की कालिख भी साफ करो
तब ही सुंदर दिख पाओगे तुम रंगीं परिधानों में

खोल के दिल को उन्हें बुलालो जो दर पर दस्तक देते
तुम्हें फ़रिश्ते दिख जायेंगे घर आये मेहमानों में

पूरी ग़ज़ल नज़र आती है सारे ही आयाम लिये
जब एक नाम खुदा मिल जाता पीतल के गुलदानों में

सब कुछ उस दम फिर जाता है वक़्त अगर फिर जाये तो
दिल ने यह महसूस किया जब तुम भी थे अनजानों में

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  • आर डी एन श्रीवास्तव

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