मेरी कविता’ -2

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लाख चाहने पर भी
घर नहीं ला पाता
खुशियाँ एक छटाक भी जब
मरहम बनकर सहलाती है
कविता तब
मेरे घाव को।

चलते-चलते जीवन-पथ पर
छला जाता हूँ जो कभी
कही, किसी साथी से अपने
देती है नव-गति हमेशा
कविता ही तो
मेरे पाँव को।

घंटों देखते सूने द्वार को
नहीं बुलावा आता माँ का
अब कभी किसी भी हाल में
तब कर देती है छाया
ममता-सिक्त आँचल का अपने
कविता ही तो
मेरे भाल पर।

जी-जीकर ढोते रिश्ते-नातों को
बंजर होने लगती भावना
संबंधों की सजग धरा पर
असहज हो जाता मेरा मन
उगते बीहड़ नागफनी के
बहुत डराते हैं आँखों को
तब भी तो नहीं देते तर्जनी
पिता अब कभी
किसी बहाने,
तब देती है सम्बल कविता
अचानक तब बाबूजी के जैसे।

सदा संगिनी यह कविता है
मेरा बचपन
मेरा बेटा
बेटी की किलकारी कविता
सारा कुनबा
गाँव-शहर सब
मेरी कविता धरा मात्र है
बंधु-बांधव सबको बनाती
ललक है रखती कहते रहने की
शेष आस अच्छा कहने की
और पलटकर देख के जाना
कविता तो है
प्रियतमा के विदा का क्षण वह।

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— केशव मोहन पाण्डेय —

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