ग़ज़ल

Share With

वो इस कदर बरसों से मुतमइन* है
जैसे बारिश से बेनूर कोई ज़मीन है

साँसें आती हैं, दिल भी धड़कता है
सीने में आग दबाए जैसे  मशीन है

आँखों में आखिरी सफर दिखता है
पसीने से तरबतर उसकी ज़बीन* है

अपने बदन का खुद किरायेदार है
खुदा ही बताए वो कैसा मकीन* है

ज़िंदगी मौत माँगे है उसकी आहों में
उसका मुआमला कितना संगीन है
….
सलिल सरोज

मुखर्जी नगर, दिल्ली

नोट:

*मुतमइन-शांत
*ज़बीन-माथा
मकीन-मकीन में रहने वाला

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Name and email are required