मैं हिंदी हूँ

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एक दिन का पर्व नहीं मैं तो युगों का गर्व हूँ,
बचपन की किलकारी से मां की लोरी तक,
अलौकिक प्रेम के अनकहे शब्द हूँ।
मां की चिंता हूँ ,पिता का दुलार हूँ,
भाई का आश्वासन ,बहन का संसार हूँ।
मैं एक भाषा नही मैं तो एक परिवार हूँ।
मैं वह संपर्क हूँ जो मन को जोड़ता है,
ह्रदय की धड़कन हूँ दिलों की झंकार हूँ,
शब्दों के बिना भी मैं प्रेम का इज़हार हूँ।
सैनिक का बलिदान हूँ, किसान का खलिहान हूँ,
शहीद की विधवा का अखण्ड स्वाभिमान हूँ।
गुरु का भय हूँ, शिष्य का संशय हूँ,
अतिथि का सत्कार हूँ ,मित्र का मनुहार हूँ,
पर्वो का उत्साह हूँ ,मृत्यु का विलाप हूँ
भक्त की भक्ति हूँ , परमात्म स्वस्ति हूँ
मैं एक संस्कृति नहीं, संस्कृतियों का समागम हूँ।
विविधता में एकता हूँ, राष्ट्र का मान हूँ।
तिरंगे को ओढ़े पूरा हिंदुस्तान हूँ ,
मैं हिंदी हूँ; हिंदुस्तान की शान हूँ।
 
तरुणा पुंडीर ‘तरुनिल’
 
 

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