देश की पीढ़ी नयी तैयार करता हूँ

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देश की पीढ़ी नयी तैयार करता हूँ ।
इस तरह मैं स्वयं का उद्धार करता हूँ ।

जो कभी उड़के गगन को छू नहीं पाते,
उन परिंदों के परों में धार करता हूँ ।

टिमटिमाये ही बिना जो डूब जाते कल,
उन सितारों से जहां उजियार करता हूँ ।

फूल, जो जाते बिखर वनफूल-सा, उनका
शुभ्र फूलों से नवल श्रृंगार करता हूँ ।

जंग लड़ने के लिए दुश्मन जमाने से,
मैं कलम को ही सदा तलवार करता हूँ ।

पालकर नफरत फ़कत नुकसान ही होता,
इसलिए मैं ‘प्रेम’ युत व्यवहार करता हूँ ।

 

प्रेम नाथ मिश्र

( स. अ.) प्रा.वि. इमलीडीह, उरुवा
जनपद – गोरखपुर

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