‘गणतंत्र दिवस काव्य-संध्या’ का सफल आयोजन

गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ और हर्फ़ प्रकाशन द्वारा आयोजित गणतंत्र दिवस काव्य-संध्या का सफल आयोजन किया गया। काव्य-संध्या में देश-प्रेम पर रचनाकारों ने अपनी विविध भाव-भूमि पर रचनाएँ प्रस्तुत की।


26 जनवरी को अनुसन्धान अपार्टमेंट, से-6, द्वारका, नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस काव्य-संध्या का सफल आयोजन किया गया। उक्त काव्य-संध्या की अध्यक्ष ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ अध्यक्ष श्री अशोक लव ने की जबकि कार्यक्रम में इलाहबाद से पधारे समाज-सेवी व विद्वान श्री अजीत सिंह मुख्य अतिथि थे। 

कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रसिद्द ग़ज़लगो इंदु मिश्र ‘किरण’ की सरस्वती वंदना ‘खड़ी हूँ देर से ले अर्चना स्वीकार कर माँ अब, पतित हूँ मैं तू जो है पावनी उद्धार कर माँ अब’ से हुई। इसके बाद मुख्य अतिथि श्री अजीत सिंह जी ने गणतंत्र दिवस की उपयोगिता और साहित्यकारों की भूमिका पर अपने विचार प्रकट किये। अध्यक्ष श्री अशोक लव ने इस तरह के आयोजन की प्रासंगिकता बताते हुए गणतंत्र व अनेक नेताओं के सूक्ष्म योगदानों को बताया।

दोनों विद्वानों के वक्तव्यों के बाद सर्व भाषा ट्रस्ट के समन्वयक केशव मोहन पाण्डेय ने ‘जिसके कण-कण बसा हुआ है ऋषि-मुनियों का ज्ञान, वह है भारत देश महान’ प्रस्तुत किया।

हर्फ़ प्रकाशन के प्रबंध निदेशक जलज कुमार अनुपम ने ‘चुनाव’ कविता से भारतीय चुनाव के एक सत्य रूप को व्यक्त किया। –
बुधन न जाति जानता है
न पंगत – पात जनता है
वह भूखा है
भात जनता है।


कवयित्री पूजा कौशिक ने भारतीय सैनिकों व सत्तारूढ़ विवशता को व्यक्त किया और भारतीय नारी की शक्ति को याद दिलाया। –
हो सके तो बस इतना कर दो ,तुम चद्दर तान के सो जाओ
समझोतो की जो बात चले, तुम गूंगे बहरे हो जाओ
अब भारत मां की छाती पर, उनको उत्पात ना करने दो
हो सके तो उनको रोक लो तुम ,या फिर हमको कुछ करने दो


काव्य-संध्या के अगले रचनाकार के रूप में केशी गुप्ता ने सीमा के बंधनों वसुधैव कुटुम्बकम की सोच पर अपनी कविता प्रस्तुत की। उनकी पंक्तियाँ थीं – देश सरहदो के नाम पर लड़ने वालो,
अपने अपने जमीर को जगा डालो।’


भोजपुरी कवि गुरविंदर सिंह ‘गुरु’ ने हास्य-व्यंग्य की भोजपुरी रचनाएँ प्रस्तुत करते हुए श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। कवयित्री नीतू पांचाल ‘निधि’ ने देशभक्ति और ओज-पूर्ण प्रस्तुति से अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई।

इंदु मिश्र ‘किरण’ ने एक बेहतरीन ग़ज़ल – किया है खेल किसने ये बताओ ज़िंदगानी से। सियासत के खिलाड़ी बच रहे हैं सच बयानी से’ प्रस्तुत की। तरुणा पुंडीर ने वर्तमान सरकार की विवशता और देश की समस्याओं के बीच में अवसरवादी राजनीति पर करारा व्यंग्य किया। उनकी पक्ति ‘मैं न गाँधी की बात करता हूँ, मैं न विकास की बात करता हूँ, मैं तो कवि हूँ, बस समाज की बात करता हूँ’ श्रोताओं ने खूब सराहा।

कार्यक्रम के इसी क्रम में राष्ट्रीय सहारा के ब्यूरो रविशंकर तिवारी ने मंच को सम्बोधित करते हुए इस सार्थक आयोजन के लिए अपना हर्ष व्यक्त किया। काव्य-संध्या के अंत में अध्यक्षता कर रहे श्री अशोक लव ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य के बाद रचनाएँ प्रस्तुत की। एक बानगी –
हर जगह मिल जायेंगे, संत चोर मक्कार।
जिसकी जैसी सोच है, वैसे उसके यार।।


कार्यक्रम का संचालक केशव मोहन पांडेय ने किया और अंत में आगंतुकों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन जलज कुमार अनुपम ने किया।

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