अन्तर्मन का दर्पण

राजेश पुरोहित

सांसें गिनती की होती है
इन्हें पल पल संभालिए

रखिये इन पर पैनी नज़र
इनका मोल पहचानिए

अन्तर्मन का दर्पण है ये
बस इनको ही सवांरिए

व्यर्थ न जाने पाए साँसे
हर पल ओम में गुजारिए

चार दिन का खेल जिंदगी
मौज के साथ इसे गुजारिए

परहित से बड़ा न काम कोई

बस इतना सबको समझाइए

खूब दिया है प्रभु ने हमें तो
पुरोहित मन मन्दिर सजाइए.

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