परुली

 

 

 

 

-नीलम पांडेय नील

परूली (लघुकथा)

दिल नी टुट विक , बस जरा सी थेची गो छी । परू हर बखत परूली की धुन में रनेर हई  तब कतु  बार चलते चलते घुरी जनेर हई  ।  विक त अघिल लै परूली,और पछिल लै परूली दिखनेर हई । अब तौं बाकर चराण मलै बाकेरीक  मुखड़ी लै परूली की जैसी ही दिखनेर हई  । रात दिन दिमागम ऐकै बात हई  कि परूली जिमदार हई और वू चौबिस कैरेटोक  बामण, अब  बौज्यू  विकौ और परूलीक  ब्या त करलै ना   । कतकै  सोचनेर होई  यस करनू  विकैं दिल्ली भजै ली जूल और वैंई पण्डिताई करबेर पाल ल्यूल और कतकै सोचनेर हई कि बौज्यूक हाथ पाँव जोड़ ल्यूल  क्ये पत्त मान जाल, रोधोबेर । बस एक परूली को देखणैक की खातिर वह दिनमान विकै घरक अघिल पिछाणी डोलनेर भई । एक दिन तो हदी है गयी उधिन उकैं परूलीक आमम  में लै परूली दिखण लगाण  भयी और उताक वू आम कैं  चाईयै रै गोई।  तब तलक आमल  ऐबैर एक रफाट दी  मुँखम और जोर जोरल बलाण फेगेई  कि “किलै रे हसी क्ये चाण छै तू मैकें, बता पगली गछै  क्ये तू, हौ हीरो पन्ती क्ये छू  मैं कब से तेरेको आवाज लगा री ठैरी रे पर तेरेको को तो मुझको लगरा पार मंगरा का मसाण लग गिया शैद” रूक आज तेरे बौज्यू हूँ,  तेरी शिकैत करनू । बस परू अपण जौस मुँख लिबेर घर भाज गोई  । लेकिन एक गड़बड़ है गेयी कि झापट खाणताक नान ककल (छोटे चाचा)  देख ली विकैं और घर में शिकैत कर दी । फिर क्ये छी जैसीकै   घर पुज कि देखते ही बौज्यूल पूछौ “किलै रे परूवा, परूली की आमा ने झापड़ किलै मारा तेरेको” यह सुनते ही परूवा की रूलाई फुट पड़ी और कहने लगा बौज्यू छोड़ो अब तुम क्ये समझौला बुड्याकाव । यह सुनते ही बौज्यू पत्त नै  क्या समझे ठैरे   कि उवी हफ्त दिल्ली वाल दाज्यू दगड़ बात करबेर  दिल्ली में मुंशीगिरीक काम सिखण लिजी भेज दी उकैं कि उधिन बै पुर चार साल दिल्ली में ही ददा की दुकान में काम सिखथे सिखथे निकल गयीं । आज वू असली मुंसी  बन गोई । ऐतू सालों में दिल्ली में उसको परूली जैसी ही एक लड़की शान्ति भौल लागण फैगेई
अब तो अंग्रेजी में भी बोलने वाला ठैरा वो उससे । बस जरा सी परूली से उसकी अनवार क्या मिलने वाली ठैरी  बल । अब कई बार कौमप्यूटर खोलते ही शान्ति ही दिखने वाली ठैरी और जब विल पत्त कर तो पत्त चौल कि शान्ति लै  चौबिस कैरेटेक बामण भई  तबतो खुशी के मारे मन ही मन लड्डू फूट गिये ठैरे उसके । अब हर बखत शान्ति  ही ठैरी कलजे में , उसिक अई तलक  परूली की तरह शान्ति कलैं विल अपण मनै की बात नी बताई भई । लेकिन फिरलै  परूली आज लै भीतेर मनै मन टीस मारनेर भई  । परू आज चार साल बाद गौं आय हौय  कि अचानक परूली कैं अपणी सामणी देखबेर रगबगी गोय …..धो धो संभौल नतर आज सिसौणक झाड़ में  खुट अलझी गौछी विक और सबेरी गध्यरम में घुरी गौछी वू। मनै मन बड़बड़ाट पाणन फैगोई “ओ ईजा खूट में  सिसौण के बबूरे उठ गये  तबलै  विल शान्त धरौ अपुकैं जब सजी धजी बिन्दुली, टिकुली और पुरी मुनई में जड़ तक माँग भरी हुई और  हाथों में लाल रंग की चुड़ी और नेलपालिस  और गोद में द्वी सालक भाव (बच्चा)लिबैर परूली विक सामणी आयी त वू ठगी जौस चाइयै रैगोय  । अचानक  परूलीक आवाजल चौंकैं  दी विकैं “ओरे परूवा कैसा है रे तू  बड़ा ही समार्ट हो गया रे दिल्ली की हवा लग्गी तेरेको तो” फिर  वो अपने बच्चे से बोली ” ओ फुंतरे चल परू मामा को पैलाग (प्रणाम )करो चलो बेबी  बोलो “मामा पैलाग” …….परूवा जैसे नींद से जागा और लगा आज उसका कलजा खपीर है बेर चुर चुर हैगो  अब क्ये नी बच उताक मन करौ  कि सबैरी सिसौण के झाड़ में ही घुरी जाछियों  त भौल हुंछी।  ये दिन देखणौक लिजी आयी भयौ वू गौं में । थ्वाड़ देरा लिजी त दिमाग सुन्न है गोई  । परूली कं क्ये फिकर वू त ईज दगड़ फसक मारणम बिजी हयी बस उताकैं परूलीक आज्ञाकारी बानर जौस च्यौल फूंटरू  खुटाँ मैं खौर धरबेर कूण फेगोई “मामा पैलाग” अहा !  परूवैल नौनक खौर में हाथ फेरौ और जोरल  इजै कैं आवाज लगै बेर “ओ ईजा आज रात को ही दिल्ली जाना है मेरेको, तू रोटी बाँध देना बैग लै तैयार छू म्योर  । अब तो उसको शान्ति की  नराई (याद) भौतैं आण लागी  फिर तो  मनै मन समझायी विल खुद कं …..छी: पण फुक परूली का क्या करना जब दिल्ली रहना है तब तो मेरी  शान्ति ही भली।

***
देहरादून ।

Comments

  • a thought by अरविन्द भारत

    सादर प्रणाम । भाषा सेतु के डूबते पत्थरों को हिमालय बनाती युग बोध की रचना

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Name and email are required