युवा प्रेरणा के अक्षय स्रोत विवेकानंद

जब आदर्श व्यक्तियों की बात आती है तब मेरे मानस पटल पर एक साथ कई चित्र उभरते हैं। दुष्टों का संहार करने के लिए धनुष-धारण किये हुए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और अक्षय मुस्कान के धनी कुवलय तथा गुंजाओं से सुशोभित, चारु वेणु-वाद करते श्रीकृष्ण का भी। परन्तु जब ऐतिहासिक महापुरुषों की ओर देखता हूँ तो एक ही रूप पर दृष्टि ठहर जाती है। चित्त प्रसन्न हो जाता है। उधर नज़र पड़ते ही दिखायी देता है उन्नत तेजयुक्त ललाट, केशरिया वस्त्र, दिखायी देती है विशाल पगड़ी। दीप्तिमान मुख मंडल। नयनाभिराम बड़री आँखें। गौर वर्ण काया। अधर पर मृदु हँसी। साथ ही दिखायी देती है कई क्रियाएँ, कई भंगिमाएँ। ध्यान मग्न चिंन्तक। मुखर वक्ता। अथक राही। दृढ़ निश्चयी युवक। सरल संन्यासी। गहन विचारक। सब कुछ एक ही व्यक्ति में देख लेता हूँ मैं। वह व्यक्तित्व है विश्वनाथ दत्त एवं भुवनेश्वरी देवी के लाल का। वह व्यक्तित्व है कोलकाता के सिमुलिया मुहल्ले के एक युवक का। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य नरेन्द्र नाथ का। वह व्यक्तित्व है भारतीय गरिमा का यशोगान करने वाले दृढ़ निश्चयी, प्रखर वक्ता स्वामी विवेकानन्द का।

स्वामी जी के व्यक्तित्व को देखने पर पता चलता है कि उनकी काया केवल हाड़-मांस-रक्त से ही नहीं सिरजी गई थी। लगता है कि लोहे की मांसपेशियाँ थी तो इस्पात की शिराएँ और उसके भीतर बज्र का मस्तिष्क था। तभी तो उनके हृदय में अपने पुरातन मूल्यों के प्रति आस्था थी तो वर्तमान के प्रति अपराजेय अक्षय क्रियाशीलता। उनमें मानव मात्र के प्रति आसक्ति थी तो भविष्य के प्रति दृढ़ संकल्प के पृष्ठ पर लिखे गए नुतन स्वप्न-सृष्टि। स्वामी जी एक विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे। देवत्व का अंश था उनमे। उनका बालपन साहस, जिज्ञासा, जिद्द तथा उत्सुकता के स्वभाव से परिपूर्ण था। वे बातों के सत्यता की खोज करते थे। सत्य के भक्त तो बाल्यावस्था से ही थे, परन्तु ‘ईश्वर सत्य है’ कि बात वे ऐसे ही कैसे मान लेते? जब कि कई प्रयास के बाद भी उन्हें ईश्वर नहीं मिला। परिणामतः स्वामी जी का युवा मन नास्तिकता की ओर प्रवृत्त हो गया। तब भी उत्सुकता गई नहीं। इसी उत्सुकता ने उन्हों एक दिन स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सत्संग में पहुँचा दिया। उत्सुकता के ही बदौलत वहाँ कमाल हो गया एक बार। ध्यान-मग्न विवेकानन्द के ललाट पर स्वामी परमहंस ने अपने पैर के अंगुठे से स्पर्श कर दिया। कहते हैं कि उनकी धरती डोल गई। पलट गई उनकी पूरी काया। विवेकानन्द का सर्वांग झनझना गया। हाड़-मांस का पिण्ड तो वहीं था मगर आँख खोले तो अंतर का सबकुछ बदल चुका था। वे कुछ-से-कुछ और हो गए थे। दृष्टि बदल गई थी। सोच बदल गई थी। इस प्रकार विश्वनाथ दत्त एवं भुवनेश्वरी देवी का बेटा भारत माँ का सच्चा सपूत विवेकानन्द हो गया। परिवर्तित विवेकानन्द की दृष्टि स्वयं या प्रकृति या जाति-वर्ग विशेष तक ही नहीं देख रही थी। वह दूरदर्शी हो गई। वह बदलाव राष्ट्र के लिए हुआ। समाज के लिए हुए। स्व से बढ़ कर पर के लिए हुआ। धर्म और संस्कृति के लिए हुआ। बदलाव भारत माता के लिए हुआ।

विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को नया व्याख्या दिया। उनका मानना था कि धर्म कल्पना की चीज नहीं, प्रत्यक्ष दर्शन की चीज है। महापुरुष सैकड़ों पुस्तकों से बढ़कर है। अनुभव का ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से कम नहीं है। उन्होंने सच्चे धर्म के क्षेत्र में पुस्तकीय ज्ञान को कम स्थान दिया। वे सच्चे मायने में चिरंतन काल तक बने रहने वाले चिर युवा थे। उन्होंने सबको प्रेरणा दी – ‘उतिष्ठत्! जाग्रत्! प्राप्य-वरान्निबोधता!’ का उद्घोष किया। स्वामी जी ने सकल जहान को मानवता और प्रेम का संदेश दिया। भारतीय संस्कृति और हिन्दू दर्शन का शंखनाद कर शिकागो के प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन में अपने अकाट्य तर्कों द्वारा सबको विस्मित कर दिया।

स्वामी विवेकानन्द प्रथम संन्यासी थे जो एक महान देशभक्त, समाज सुधारक, तथा राष्ट्रीय पुनरूत्थान की शक्तियों को प्रचारित करने वाले युगपुरुष भी थे। स्थिर व्यक्तित्व के संन्यासी स्वामी विवेकानन्द में राष्ट्रीय चेतना थी। मानवता से प्रेम था। अपनी संस्कृति से असीम अनुराग था। स्वामी विवेकानन्द ने अपने उज्ज्वल व्यक्तित्व से सिद्ध कर दिया कि ‘न हिं मनुष्यात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्।’ विवेकानन्द ने इस विचार को पुनः स्थपित किया कि पक्षियाँ सुन्दर हैं। उनका कलरव मधुर है। पुष्पों में अक्षय सुन्दरता है। उनका गंध सबसे बढ़कर है। लेकिन मानव सुन्दरतम है। मानव धन्य है। मनुष्य की ही सुन्दरता से प्रकृति रमणिक है। अच्छी बात है कि आज विचारों का बदलाव हो रहा है। तो क्या? बदलाव तो प्रकृति की शाश्वत प्रक्रिया है। इसका अर्थ सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, सामाजिक, मानवीय आदि मूल्यों को भुलाना तो नहीं होता? आज का प्रत्येक मानव साइबर से जुड़ रहा है तो क्या? प्रगतिशील सोच रखने वाला व्यक्ति, समाज या धर्म हथियारों का जखिरा नहीं तैयार करता, वह तो प्रेम और मानवता का फूल सजाता है।

आज का वातावरण बदल रहा है। परिवेश में परिवर्तन हो रहा है। तब परिवर्तन की इस घड़ी में हमें अपने विरासत, अपनी संस्कृति, अपनी गरिमा और पहचान को भूलाना नहीं चाहिए अपितु नवीनता से विकास की गति के साथ गतिशील होकर देखना चाहिए। साथ ही जहाँ कहीं भी शक्ति के ह्रास की अनुभूति हो युवा प्रेरणा के अक्षय स्रोत विवेकानन्द का स्मरण करना चाहिए। उनके विचारों और सोच को आत्मसात् करना चाहिए। जीवन को निरंतर सकारात्मक सोच से सजाना चाहिए मानवता के गंध से मँहकाना चाहिए और स्नेह से सींच कर सुरभित संसार को समृद्ध करना चाहिए।

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केशव मोहन पाण्डेय

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